ज़िन्दगी में सरा-ए-फ़ानी में
आग किस ने लगाई पानी में
कुछ ज़ियादा अज़ीज़ था मुझ को
शख़्स जो मर गया कहानी में
चाय पीते हैं चाँद तकते हैं
खोए रहते हैं रात रानी में
ख़ुद-कुशी का ख़याल आता है
रोग क्या लग गया जवानी में
रौशनी को तो बुझना होता है
तीरगी ही है ज़ाविदानी में
— Agnivendra Singh














