हैं लब लतीफ़ उसके क़ठ गुलाब की तरह
चमकता उसका रुख़ है माहताब की तरह
ये लग रही है तुमको जो शराब की तरह
पर उतरे है गले से ये भी आब की तरह
बस इक दो पन्ने पढ़के जान सकती है मुझे
मुझे समझ रही है वो किताब की तरह
निका़ह के दिन उसके आ रहें क़रीब अब
ये नेमतें उतर रही अज़ाब की तरह
उतारना है सदक़ा गुज़रे साथ वक़्तों का
मैं लिख रहा हूँ वस्ल को हिसाब की तरह
जहान भर में हो रहा है रुसवा 'अहमद' अब
वो पर इसे भी लेता है ख़िताब की तरह
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