मुसीबतों से ही भरपूर लगती है
ये ज़िन्दगी मुझे नासूर लगती है
कुरेदे है ये सारे ज़ख़्मों को मिरे
ये याद हिज्र की मज़दूर लगती है
बुरी तरह ग़मों ने चाटा है उसे
वो लड़की जो तुम्हें मसरूर लगती है
मिरे क़रीब में तन्हाई है मगर
ये बोलती नहीं मग़रूर लगती है
स़दा है सैक़ड़ों ख़ामोशियों की वो
जो बोलने से भी माज़ूर लगती है
सुने हुए हैं तेरे शे'र हर जगह
तिरी हर इक ग़ज़ल मशहूर लगती है
मिरे दुखों को मुझ सेे पहले जाने है
वो मांँ नहीं ख़ुदा का नूर लगती है
जब आती है पहन के काली साड़ी वो
क़सम ख़ुदा की अहमद हूर लगती है
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