museebaton se hi bharpoor lagti hai | मुसीबतों से ही भरपूर लगती है

  - Faiz Ahmad

मुसीबतों से ही भरपूर लगती है
ये ज़िन्दगी मुझे नासूर लगती है

कुरेदे है ये सारे ज़ख़्मों को मिरे
ये याद हिज्र की मज़दूर लगती है

बुरी तरह ग़मों ने चाटा है उसे
वो लड़की जो तुम्हें मसरूर लगती है

मिरे क़रीब में तन्हाई है मगर
ये बोलती नहीं मग़रूर लगती है

स़दा है सैक़ड़ों ख़ामोशियों की वो
जो बोलने से भी माज़ूर लगती है

सुने हुए हैं तेरे शे'र हर जगह
तिरी हर इक ग़ज़ल मशहूर लगती है

मिरे दुखों को मुझ सेे पहले जाने है
वो मांँ नहीं ख़ुदा का नूर लगती है

जब आती है पहन के काली साड़ी वो
क़सम ख़ुदा की अहमद हूर लगती है

  - Faiz Ahmad

Kisaan Shayari

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