करम की इक नज़र कर दे
तू हम को हम-सफ़र कर दे
जो दिल में है लबों पे ला
तू बात मुख़्तसर कर दे
यहीं पे मै-ए-कोहना को
हलाल-ओ-बे-ज़रर कर दे
दु'आओं में असर दे दे
नज़र को चश्म-ए-तर कर दे
मैं उस समय नशे में था
ख़ताएँ दर-गुज़र कर दे
सुकून चाहिए मुझ को
हयात मुख़्तसर कर दे
इनायत इस तरफ़ साक़ी
सुराही को इधर कर दे
मोहब्बतें उभरती हैं
वो जिस तरफ़ नज़र कर दे
हमारी ईद हो जाए
वो गर नज़र इधर कर दे
बनेगा क्या तिरा 'अहमद'
वो रब्त तर्क अगर कर दे
— Faiz Ahmad















