मैंने कई शबें काटी इस ऐतबार में
तू लौट आएगी मैं रहा इंतेज़ार में
मेरी तरह किसे ज़िन्दगी में मिला है ये
शामिल हुआ जो बाइस तिरे बादाख्वार में
मैं ढूंडने लगा हूँँ दिसंबर में जून को
ये सब बताते हैं पड़ गया हूँँ मैं प्यार में
उस सेे करेंगे क्या शिकवा हम जो बदल गया
हम भी कहाँँ थे खुदके कभी इख्तियार में
न जीत लूं उसे 'इश्क़ के इम्तेहान में
वो सब बदल रहा है मिरे इख्तिबार में
नफ़रत की है गुज़ारिश मुझे हर किसी से अब
ये दिल बिगड़ गया है मिरा लाड-प्यार में
मैं जिस सेे खुदके गम भी नहीं संभले जाते हैं
और वो के ढूंडता है मुझे गम-गुसार में
बस तू ही है मोहब्बत मिरी और रहेगी भी
गर तू कहे तो कह दूं ये सब इश्तिहार में
जिसकी सताती थी फिक्र दिन रात मुस्तकिल
अहमद ने खो दिया उसको ही इगतिरार में
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