
जश्न-ए-मक़तल को मिरे शाम मनाते तो सही
तुम चराग़ों को हवाओं में जलाते तो सही
पा-ब-जौलाँ ही सही दौड़ के आता मैं तो
अपने जानिब मुझे इक बार बुलाते तो सही
— Faiz Ahmad
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