तुरफ़ा-ओ-चेहरा-ए-तरब थी तुमजीने का इक फ़क़त सबब थी तुमथा मुलाज़िम ख़ुदा का इस ख़ातिरदिल-ए-मज़दूर की कसब थी तुम— Faiz Ahmad