जमातो में नमाजो़ में कभी नहीं मिलेगा

मिलेगा फ़ैज़ मय-कदे में गर कहीं मिलेगा

तू ढूंँढ़ना अगर जो चाहे तो तलाश करले
मगर मुझ ऐसा बादाकश कहीं नहीं मिलेगा

फरिश्तों ने भी मेरी क़ब्र को कुछ ऐसे ढूंँढा
इधर अज़ाब सख़्त है सो वो यहीं मिलेगा

लिपट रहे हैं साक़ी से ये जानते हुए भी
कि तेरा कुर्ब सा सुकूंँ इधर नहीं मिलेगा

मैं मांँगने लगा तुझे जो फूट के दुआ में
कहा ख़ुदा ने ख़ूब रो ले पर नहीं मिलेगा

— Faiz Ahmad

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