यूँँ तो तिरे साए में भी रा'नाई बहुत है

पर बज़्म सजाने को तो तन्हाई बहुत है

तू जिस को भी चाहे उसे दीवाना बना ले
ये शहर तिरे हुस्न का शैदाई बहुत है

क्यूँकर हो दम-ए-सूर से वहशत मुझे आख़िर
मुझ को तो तिरी शादी की शहनाई बहुत है

हम जाह-तलब शख़्स हमें कब ये पता था
ये इश्क़ है और इश्क़ में रुस्वाई बहुत है

कर देती है दुश्वार रग-ए-जाँ का धड़कना
ये ज़ुल्फ-ए-सियाह-फाम सितमज़ाई बहुत है

दिल शौक़ के मारे न कहीं जान गँवा दे
सुनते हैं तिरी आँखों में गहराई बहुत है

— Faiz Ahmad

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