अपने दर्द पर उस को हँसता देखना है
चले जितने भी दिन अब ये तमाशा देखना है
कि उस का अक्स अब आँखों में समा जाए ऐसे
कि उस को आज मुझे इतना ज़ियादा देखना है
अब 'अख़्तर' का क़त्ल उस की रज़ा से होगा
तो फिर आज मुझे उस का इरादा देखना है
— Parwez Akhtar
चले जितने भी दिन अब ये तमाशा देखना है
कि उस का अक्स अब आँखों में समा जाए ऐसे
कि उस को आज मुझे इतना ज़ियादा देखना है
अब 'अख़्तर' का क़त्ल उस की रज़ा से होगा
तो फिर आज मुझे उस का इरादा देखना है
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