zamaana ishq ke maaron ko maat kya dega | ज़माना इश्क़ के मारों को मात क्या देगा

  - Akhtar Saeed Khan

ज़माना इश्क़ के मारों को मात क्या देगा
दिलों के खेल में ये जीत हार कुछ भी नहीं

  - Akhtar Saeed Khan

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    दुख तो बहुत मिले हैं मोहब्बत नहीं मिली
    यानी कि जिस्म मिल गया औरत नहीं मिली

    मुझको पिता की आँख के आँसू तो मिल गए
    मुझको पिता से ज़ब्त की आदत नहीं मिली
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    Abhishar Geeta Shukla
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    नींद के दायरे में हाज़िर हूँ
    ख़्वाब के रास्ते में हाज़िर हूँ

    याद है इश्क़ था कभी मुझसे
    मैं उसी सिलसिले में हाज़िर हूँ
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    Ejaz Tawakkal Khan
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    इक कली की पलकों पर सर्द धूप ठहरी थी
    इश्क़ का महीना था हुस्न की दुपहरी थी

    ख़्वाब याद आते हैं और फिर डराते हैं
    जागना बताता है नींद कितनी गहरी थी
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    Vikram Gaur Vairagi
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    इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
    यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़
    Meer Taqi Meer
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    मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
    मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
    Mirza Athar Zia
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    इश्क़ को पूछता नहीं कोई
    हुस्न का एहतिराम होता है
    Asrar Ul Haq Majaz
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    बाद में तुम से इश्क़ कर लेंगे
    पहले ख़ुद से तो प्यार कर लें हम
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    होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
    क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
    Meer Taqi Meer
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    मेरा किरदार मेरी बात कहाँ सुनता है,
    यह समझदार मेरी बात कहाँ सुनता है

    इश्क़ है वादा फ़रामोश नहीं है कोई,
    दिल तलबग़ार मेरी बात कहाँ सुनता है
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    Vishal Singh Tabish
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    मैं सात साल से अब तक हिसार-ए-इश्क़ में हूँ
    वो शख़्स आज भी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ में है
    Amaan Haider

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As you were reading Shayari by Akhtar Saeed Khan

    आज भी दश्त-ए-बला में नहर पर पहरा रहा
    कितनी सदियों बाद मैं आया मगर प्यासा रहा

    क्या फ़ज़ा-ए-सुब्ह-ए-ख़ंदाँ क्या सवाद-ए-शाम-ए-ग़म
    जिस तरफ़ देखा किया मैं देर तक हँसता रहा

    इक सुलगता आशियाँ और बिजलियों की अंजुमन
    पूछता किस से कि मेरे घर में क्या था क्या रहा

    ज़िंदगी क्या एक सन्नाटा था पिछली रात का
    शमएँ गुल होती रहीं दिल से धुआँ उठता रहा

    क़ाफ़िले फूलों के गुज़रे इस तरफ़ से भी मगर
    दिल का इक गोशा जो सूना था बहुत सूना रहा

    तेरी इन हँसती हुई आँखों से निस्बत थी जिसे
    मेरी पलकों पर वो आँसू उम्र भर ठहरा रहा

    अब लहू बन कर मिरी आँखों से बह जाने को है
    हाँ वही दिल जो हरीफ़-ए-जोशिश-ए-दरिया रहा

    किस को फ़ुर्सत थी कि 'अख़्तर' देखता मेरी तरफ़
    मैं जहाँ जिस बज़्म में जब तक रहा तन्हा रहा
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    Akhtar Saeed Khan
    दीदनी है ज़ख़्म-ए-दिल और आप से पर्दा भी क्या
    इक ज़रा नज़दीक आ कर देखिए ऐसा भी क्या

    हम भी ना-वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-महफ़िल से मगर
    चीख़ उठें ख़ामोशियाँ तक ऐसा सन्नाटा भी क्या

    ख़ुद हमीं जब दस्त-ए-क़ातिल को दुआ देते रहे
    फिर कोई अपनी सितमगारी पे शरमाता भी क्या

    जितने आईने थे सब टूटे हुए थे सामने
    शीशागर बातों से अपनी हम को बहलाता भी क्या

    हम ने सारी ज़िंदगी इक आरज़ू में काट दी
    फ़र्ज़ कीजे कुछ नहीं खोया मगर पाया भी क्या

    बे-महाबा तुझ से अक्सर सामना होता रहा
    ज़िंदगी तू ने मुझे देखा न हो ऐसा भी क्या

    बे-तलब इक जुस्तुजू सी बे-सबब इक इंतिज़ार
    उम्र-ए-बे-पायाँ का इतना मुख़्तसर क़िस्सा भी क्या

    ग़ैर से भी जब मिला 'अख़्तर' तो हँस कर ही मिला
    आदमी अच्छा हो लेकिन इस क़दर अच्छा भी क्या
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    Akhtar Saeed Khan
    मौज-ए-शमीम हैं न ख़िराम-ए-सबा हैं हम
    ठहरी हुई गुलों के लबों पर दुआ हैं हम

    बेगाना ख़ल्क़ से हैं न तुझ से ख़फ़ा हैं हम
    ऐ ज़िंदगी मुआ'फ़ कि दैर-आश्ना हैं हम

    इस राज़ को भी फ़ाश कर ऐ चश्म-ए-दिल-नवाज़
    काँटा खटक रहा है ये दिल में कि क्या हैं हम

    यारब तिरा कमाल-ए-हुनर हम पे ख़त्म है
    या सिर्फ़ मश्क़-ए-नाज़ का इक तजरबा हैं हम

    आख़िर तिरे सुलूक ने झुटला दिया इसे
    इक ज़ो'म था हमीं कि सरापा वफ़ा हैं हम

    कल इस ज़मीं पे उतरेंगे फूलों के क़ाफ़िले
    इक पैकर-ए-बहार की आवाज़-ए-पा हैं हम
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    Akhtar Saeed Khan
    इक किरन मेहर की ज़ुल्मात पे भारी होगी
    रात उन की है मगर सुब्ह हमारी होगी

    हम-सफ़ीरान-ए-चमन मिल के पुकारें तो ज़रा
    यहीं ख़्वाबीदा कहीं बाद-ए-बहारी होगी

    इस तरफ़ भी कोई ख़ुश्बू से महकता झोंका
    ऐ सबा तू ने तो वो ज़ुल्फ़ सँवारी होगी

    ये जो मिलती है तिरे ग़म से ग़म-ए-दहर की शक्ल
    दिल ने तस्वीर से तस्वीर उतारी होगी

    बू-ए-गुल आती है मिट्टी से चमन की जब तक
    हम पे दहशत न ख़िज़ाँ की कभी तारी होगी
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    Akhtar Saeed Khan
    सर में सौदा-ए-वफ़ा रखते हैं
    हम भी इस अहद में क्या रखते हैं

    वास्ता जिस का तिरे ग़म से न हो
    हम वो हर काम उठा रखते हैं

    बिन खिली एक कली पहलू में
    हम भी ऐ बाद-ए-सबा रखते हैं

    बुत-कदे वालो तुम्हें कुछ बोलो
    वो तो चुप हैं जो ख़ुदा रखते हैं

    ग़ैरत-ए-इश्क़ कोई राह निकाल
    ज़ुल्म वो सब पे रवा रखते हैं

    क्या सलीक़ा है सितमगारी का
    रुख़ पे दामान-ए-हया रखते हैं

    चारा-साज़ान-ए-ज़माना ऐ दिल
    ज़हर देते हैं दवा रखते हैं

    नग़्मा-ए-शौक़ हो या नाला-ए-दिल
    दर्द-मंदाना सदा रखते हैं

    दिल की ता'मीर को ढा कर 'अख़्तर'
    वो मोहब्बत की बिना रखते हैं
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    Akhtar Saeed Khan

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