हर क़दम एक ख़्वाब है कोई
जिस
में छुपता अज़ाब है कोई
साज़ है पर नवाज़िशें कम हैं
दिल में छुपता जवाब है कोई
हम जिसे जानकर गले से मिले
वो ही निकला हिसाब है कोई
ग़म को रक्खा है जैसे फूलों में
तेरा अंदाज़-ए-ख़्वाब है कोई
अब न वो रौशनी न साया है
घर में जैसे ख़राब है कोई
दास्तान-ए-ग़ज़ल सुना दूँ मैं
तू अगर हम-नवाब है कोई
— amit kumar gangle















