आज उस के सहारे से घर जाऊँगा
साथ छूटा तो जाने किधर जाऊँगा
हुस्न उस का है इक ख़ूब-सूरत नशा
गर नशा ये चढ़ा तो निखर जाऊँगा
ज़िंदगी काँच सी है गुज़ारी यहाँ
यूँ न मुझ को उछालो बिखर जाऊँगा
जाँ मेरी मिलने मुझ से अब आई अगर
चूम कर उस को हद से गुज़र जाऊँगा
सोचता हूँ तेरे बारे में जब कभी
ऐसा लगता है मुझ को के मर जाऊँगा
इश्क़ है तुझ से ही मुझ को ऐ हम-नशीं
हाँ मगर सामने पर मुक़र जाऊँगा
इक दफ़ा ही सही तू नज़र तो मिला
दिल में नज़रों के रस्ते उतर जाऊँगा
— Anchal Maurya















