जो कही उस सेे ज़ियादा अनकही अच्छी लगेगी
दिल सुने गर दिल की तो फिर ख़ामुशी अच्छी लगेगी
इस कड़ी गर्मी में तेरी छाँव मिल आए अगरचे
गर्दिश-ए-दौराँ में भी ये ज़िंदगी अच्छी लगेगी
तुम को भी महसूस होगा इस दिल-ए-मुज़्तर का ग़म जब
ज़ाविया तुम पर खुलेगा शा'इरी अच्छी लगेगी
हसरतें सब मोम के मानिंद पिघलें बा'द उस के
चाँदनी में तीरगी की बेरुख़ी अच्छी लगेगी
सच तो ये है इख़्तियार-ए-शौक़ जब हो जाएगा तब
वक़्त-ए-मर्ग-ए-हिज्र में भी आशिक़ी अच्छी लगेगी
मौत की उस शाहज़ादी के गले लग जाएँगे फिर
रफ़्ता-रफ़्ता आशिक़ों को ख़ुद-कुशी अच्छी लगेगी
शहर की राहों में कुछ दिन भीड़ बनके गर चलो तुम
बा'द उस के गाँव की ये धूप भी अच्छी लगेगी
आइना-गर जो बता दे सच कि आईना है शब-रंग
ज़ुल्मत-ए-शब की भी 'अंचल' तीरगी अच्छी लगेगी















