कहाँ फसें हैं इन अल्फ़ाज़ और मआ'नी में
ये देखिए कि ग़ज़ल कितनी है रवानी में
बहार आई है लेकिन कोई कली न खिली
कहीं कमी तो नहीं मेरी बाग़-बानी में
तेरा चराग़-ए-वजूद उस के दम से रौशन है
वो जिस को भूल गया है तू बद-गुमानी में
यक़ीन मान के मुश्किल लगा था मुझ को भी
जहाँ बनाना है आसाँ जहान-ए-फ़ानी में
कुछ आप मैं ने बढ़ाया है रोग मेरे तबीब
कुछ आपने भी संवारा है मेहरबानी में
ये और बात कहानी से हम निकाले गए
ये और बात कि बस हम ही थे कहानी में
फिर उस के बा'द का क़िस्सा जहाँ सुनाएगा
तुम अपने आप को बस फेंक आना पानी में
ये शे'र आख़िरी "ग़ाफ़िल" का, आख़िरी ऊला
नज़र न आएँगे वो इस के बा'द सानी में















