ज़िंदगी ठीक से जिया ही नहीं
कब जिऊँगा मुझे पता ही नहीं
मैं हूँ मेहमान कुछ दिनों का यहाँ
कोई शिकवा कोई गिला ही नहीं
मैं अकेला यहाँ तक आया हूँ
हम सफ़र राह में मिला ही नहीं
इश्क़ में सब गँवा के भी 'अरबाब'
अपने महबूब से मिला ही नहीं
— Arbab Shaz
कब जिऊँगा मुझे पता ही नहीं
मैं हूँ मेहमान कुछ दिनों का यहाँ
कोई शिकवा कोई गिला ही नहीं
मैं अकेला यहाँ तक आया हूँ
हम सफ़र राह में मिला ही नहीं
इश्क़ में सब गँवा के भी 'अरबाब'
अपने महबूब से मिला ही नहीं
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