जो छूट सके हम सेे उसे लत न कहेंगे
सच ये है तुम्हें हम कभी आदत न कहेंगे
मैं ख़ून बहाने में कभी पीछे नहीं था
पर लोग तो पी कर इसे शरबत न कहेंगे
मैं जिस्म के जूते से भला नग्न ही अच्छा
पर आप मेरे इश्क़ को उल्फ़त न कहेंगे
जो मूँद सको आँख तो फिर मूँद ही लेना
सच देख के भी आप तो बिदअत न कहेंगे
बच्चों ने जिसे पाँव दबाया ही नहीं है
हम छत को पतंगों के बिना छत न कहेंगे
ये जिस्म कहीं और है ये रूह कहीं और
पर आप तो अब्बा इसे ज़िल्लत न कहेंगे
चुप-चाप अधर खाने हैं अब लोहे के चावल
ये देख के भी लोग बग़ावत न कहेंगे
— Prabhat Adhar















