मुझ-सा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

साया मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

चश्मा हटा के आँख से देखा जो आइना
चेहरा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

जो देखिए तो ख़ुद-कुशी कितनी अजीब थी
जीना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

भरने को हर्फ़ भर दिए मानी नहीं भरे
लिखना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

आने पे मेरे आप तअज्जुब न कीजिए
जाना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

मंज़िल है इस तरफ़ मुझे जाना है उस तरफ़
रस्ता मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

दरिया के पास रह के भी करता नहीं वुज़ू
चश्मा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

अस्मत बचा रहा है वो परवरदिगार की
नेता मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

देखा था एक मुल्क सियासत नहीं दिखी
सपना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

मायूस हो गया है अँगूठे से हार कर
जूता मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

क्यूँ सज-सँवर के बैठा है राशन बिना रसोई
चूल्हा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

जन्नत के बदले उस को मेरी जान चाहिए
मौला मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

बोला था उस को फिर कभी आऊँगा लौट कर
वा'दा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

माखन चुरा भी सकता है गोपी के वास्ते
कान्हा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

देखा मुझे उदास तो शाइ'र कहा गया
चर्चा मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

कुछ इस लिए 'अधर' हुआ ग़ैरों से वास्ता
अपना मेरा तो और भी अजीब-ओ-ग़रीब है

— Prabhat Adhar

More by Prabhat Adhar

Other ghazal from the same pen

See all from Prabhat Adhar →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling