इतने सालों बा'द भी वो मुश्किलें सिमटी नहीं
वरना ऐसे ज़िंदगी बेकार में कटती नहीं
मैं लगा था कब से उस को तो मनाने के लिए
यार उस के सीने से तो आग अब बुझती नहीं
मैं अँधेरों में भी रिश्ता रौशनी से रखता था
अब तो दिल में बाती दीपक की कभी जलती नहीं
ख़्वाब उस का आँखों से महरूम मैं ने कर दिया
तब से आँखें अब किसी भी बात पर हँसती नहीं
— Shubham Upwan














