मैं मोहब्बत के सिवा कुछ और करता ही नहीं
दिल से मैं अब तो किसी के भी उतरता ही नहीं
ज़िंदगी के बारे में इतना मैं क्यूँ सोचूँ भला
वो मोहब्बत मैं मुझे खोने से डरता ही नहीं
बे-असर हो जाती है अब ज़िंदगी से ही दुआ
ज़िंदगी में रंग अब कोई भी भरता ही नहीं
— Shubham Upwan














