मैं मोहब्बत के सिवा कुछ और करता ही नहीं
दिल से मैं अब तो किसी के भी उतरता ही नहीं
ज़िंदगी के बारे में इतना मैं क्यूँ सोचूँ भला
वो मोहब्बत मैं मुझे खोने से डरता ही नहीं
बे-असर हो जाती है अब ज़िंदगी से ही दुआ
ज़िंदगी में रंग अब कोई भी भरता ही नहीं
कितने पत्थर खाए हैं हम ने सफ़र में अब भला
मसअला ये है सफ़र अब वो गुज़रता ही नहीं
डर सताता सहम जाता हूँ बिना तेरे मैं अब
पर सितम है मैं बिना तेरे निखरता ही नहीं
— Shubham Upwan














