चाँदनी शबनम सबा ख़ुशबू सहर नग़्मा बदन
डाल कर आँखों में आँखें बोलने वाला बदन
सुब्ह की पहली किरन महताब का साया बदन
रेशमी ख़्वाबों के जैसा नूर में डूबा बदन
कितने मय-ख़्वारों की मंज़िल या कि गुलदस्ता बदन
कितने ही प्यासों का पनघट तेरा मयख़ाना बदन
बस इन्हीं दोनों के क़िस्से आज-कल हैं शहर में
इक मिरी प्यासी नज़र और इक तिरा शोला बदन
कोई शाइर ही बता सकता है इसका ज़ाइका
कोरी मिट्टी के कटोरे की तरह कोरा बदन
देखिए फिर देखिए और देखते रह जाइए
सर से ले कर पाँव तक है चेहरा ही चेहरा बदन
ख़ुश्बुओं के पैरहन में मुस्कुराती रौशनी
बिजलियों की हमनवा फूलों का हम सेाया बदन
है उन्हीं के दम से अबके इस ग़ज़ल में नग़्मगी
माहवश रेशम अदा बादा नज़र ग़ुंचा बदन
जा के दरिया पर बरस जाता है ये बादल 'बशर'
और इक इक बूँद को तरसे मिरा प्यासा बदन
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