आरज़ू अब घट रही है बाक़ी तो सब ठीक है
ज़ीस्त कुछ यूँ कट रही है बाक़ी तो सब ठीक है
लब रहे हैं मुस्कुराते आँधियों के बीच भी
माथ पर सिलवट रही है बाक़ी तो सब ठीक है
क्या सितम है सिर्फ़ हम को ज़िन्दगी तू छोड़ के
हर किसी से सट रही है बाक़ी तो सब ठीक है
दिन निकलता है मिरा दुश्वारियों से जंग में
रात इक करवट रही है बाक़ी तो सब ठीक है
मुफ़्लिसी से हम को यारों इतना सा है बस गिला
दुनिया हम से कट रही है बाक़ी तो सब ठीक है
— Deenbandhu Jaiswal















