लाख चाहे बाइस-ए-आज़ार होना चाहिए था
दिन बदलने का मगर आसार होना चाहिए था
मैं कहाँ ये कह रहा फलदार होना चाहिए था
कम से कम ये पेड़ साया-दार होना चाहिए था
फूल हो बस इस लिए तुम रोज़ मसले जा रहे हो
वक़्त जैसा है तुम्हें तो ख़ार होना चाहिए था
जिस तरह झूठी ख़बर को आप फैलाते यहाँ हैं
आप को इंसाँ नहीं अख़बार होना चाहिए था
डूबती कश्ती नहीं गर आप जो थोड़ा समझते
आप को तूफ़ाँ नहीं पतवार होना चाहिए था
ज़ीस्त भर इक शख़्स से आगे नहीं कुछ सोच पाना
इश्क़ में क्या यूँ कोई लाचार होना चाहिए था
जिस तरह से धर्म का नुक़सान होता जा रहा है
अब तलक तो कल्कि का अवतार होना चाहिए था
— Deenbandhu Jaiswal















