मिट्टी के घर को जैसे ये बरखा नहीं पसंद
मुझ को भी मेरी जाँ तिरा रोना नहीं पसंद
माना कि कोई ख़्वाब मुकम्मल नहीं हुआ
इतनी सी बात पे हमें मरना नहीं पसंद
इतना बहुत है शे'र मिरे हैं उसे पसंद
फिर क्या हुआ उसे मिरा चेहरा नहीं पसंद
नफ़रत हो चाहे इश्क़ हो पूरा ही कीजिए
हो रब्त कोई भी मुझे आधा नहीं पसंद
कोई भी शख़्स शौक़ से रोता नहीं है यार
दिल खोल कर किसे यहाँ हँसना नहीं पसंद
पत्थर बहुत है ज़ीस्त के रस्ते में है सुना
ठोकर के डर से पर मुझे रुकना नहीं पसंद
— Deenbandhu Jaiswal















