Meaning of

क़ाफ़िया

qaafiya • قافیہ

तुक; छंद

rhyme; poetic meter

قافیہ; وزن

Arabic

तुम हो पूरी ग़ज़ल, बिंदी उस
में रदीफ़
और झुमका मुझे क़ाफ़िया सा लगे

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मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में

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लिखना जो हुआ ख़ुद को इक दिया लिखूँगा मैं
दिलरुबा को अपने बहती हवा लिखूँगा मैं

बे-चैन हो ख़त पढ़ के उस को नींद ना आए
नाम अपना कोने में सर-फिरा लिखूँगा मैं

इश्क़ की ग़ज़ल मेरी हो गई मुकम्मल तो
ख़ुद रदीफ़ बन तुम को क़ाफ़िया लिखूँगा मैं

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ये मिरी ग़ज़ल का मिज़ाज है कि वो क़ाफ़िए के ख़िलाफ़ है
कभी रक़्स करती है अक्स पर अभी आईने के ख़िलाफ़ है

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रदीफ़ो-क़ाफ़िया-ओ-बह'र का भी इल्म है लाज़िम
फ़क़त दिल टूट जाने से कोई शाइ'र नहीं बनता

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मैं ग़ज़ल कहता हूँ जिस के काफ़िया हैं राम जी
शा'इरी में इक नया सा ज़ाविया हैं राम जी

लड़ रही अंदर ही अंदर युध्द जग के रीत से
जो कभी हारी नहीं थी वो सिया हैं राम जी

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इस ज़िंदगानी की ग़ज़ल का क़ाफ़िया सा लगता है
उस के बिना तो जैसे पूरा घर बुझा सा लगता है

यूँँ तो कोई मंदिर नहीं दुनिया में उस के नाम का
लेकिन न जाने क्यूँ मुझे वो देवता सा लगता है

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अदीब दुनिया समझ रही है तो क्यूँँ न ख़ुद को वहीद कर लूँ
तराश कर हर हुनर को अपने मज़ीद मुर्शिद मुरीद कर लूँ

रदीफ़ बाँधूँ ग़ज़ल में ऐसा हर इक मआ'नी फ़रीद कर लूँ
जरीद लूँ क़ाफ़िए के अश'आर मैं सभी अब शदीद कर लूँ

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अकेला ही रहा हूँ मैं अकेले ग़लतियाँ ढोई
वही हूँ शब्द मैं जिस का नहीं है क़ाफ़िया कोई

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शा'इरी के सिवा और भी काम है
क़ाफ़िया के बिना शे'र बदनाम है

चाय सिगरेट रोटी मकाँ सब तो है
फिर भी बन्दे को क्यूँ रोना हर शाम है

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तुम हो पूरी ग़ज़ल, बिंदी उस
में रदीफ़
और झुमका मुझे क़ाफ़िया सा लगे

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मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में

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'क़ाफ़िया' मूल रूप से कविता में तुक या छंद को संदर्भित करता है, जो छंदों को एक साथ बांधने वाला एक संरचनात्मक तत्व है। काव्यात्मक क्षेत्र में, यह केवल संरचना से परे जाकर पाठक की आत्मा के साथ गूंजने वाली एक धुन बन जाती है, जो सामंजस्य और लय का निर्माण करती है।

कवि 'क़ाफ़िया' का उपयोग ध्वनि और अर्थ की एक बुनावट बनाने के लिए करते हैं। यह कविता की संगीतात्मकता को बढ़ाने का एक उपकरण है, जो पाठकों को शब्दों के नृत्य में खींचता है। 'क़ाफ़िया' का चयन कविता के भावनात्मक प्रभाव को बदल सकता है, गहराई और गूंज जोड़ सकता है।

कवि के हाथों में, 'क़ाफ़िया' केवल तुक नहीं है; यह कविता की धड़कन है, जो आत्मा के मौन संगीत को प्रतिध्वनित करती है।