मैं ग़ज़ल कहता हूँ जिस के काफ़िया हैं राम जीशा'इरी में इक नया सा ज़ाविया हैं राम जीलड़ रही अंदर ही अंदर युध्द जग के रीत सेजो कभी हारी नहीं थी वो सिया हैं राम जी— Aakash Giri