पागल की तरह मैं हो गया हिज्र काट कर
मत पूछो तुम कि कैसा लगा हिज्र काट कर
दुश्वार साँस लेना हमारा है जब तलक
चलती नहीं है यार हवा हिज्र काट कर
इक क़ैदी काटता है सज़ा जैसे जेल में
वैसा ही मेरा हाल हुआ हिज्र काट कर
ता'उम्र ये सितम भी मुझे झेलना पड़ा
तारी फ़िराक-ए-यार रहा हिज्र काट कर
मजनूँ की तरह दश्त में रहना नहीं मुझे
फ़ौरन मैं शहर लौट गया हिज्र काट कर
इक रम्ज़ ये कि मुझ को सज़ा कैसे देगा वो
पहले ही पा चुका हूँ सज़ा हिज्र काट कर
दुख हिज्र से बड़ा कोई भी दूसरा नहीं
आकाश देखो तुम भी ज़रा हिज्र काट कर
— Aakash Giri















