मैं दिन रात सुनता हूँ आओ बचाओ
कोई चीख़ता है बचाओ बचाओ
हमारी कहानी में क़ासिद है ज़िंदा
कि अपनी कहानी में जाओ बचाओ
नहीं पूछना क्या लुटाया बचाया
तुम्हारी जो मर्ज़ी लुटाओ बचाओ
तुम्हें गर बचाना है खेतों में पानी
अदालत के चक्कर लगाओ बचाओ
जो दरिया में पानी बचाते नहीं हो
तो आँखों से अपने बहाओ बचाओ
तुम्हें हम सितमगर समझने लगे हैं
सितमगर नहीं हो तो आओ बचाओ
बचा गर नहीं पाए तो कम से कम तुम
सदा ही लगाते बचाओ बचाओ
— Aakash Giri















