Rafi Raza

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Rafi Raza shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rafi Raza's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तेरी आवाज़ मेरा रिज़्क हुआ करती थी तू मुझे भूख से मारेगा ये सोचा नहीं था — Rafi Raza
तुम्हारे पाँव क़सम से बहुत ही प्यारे हैं ख़ुदा करे मेरे बच्चों की इन में जन्नत हो — Rafi Raza

Ghazal

वहशत में निकल आया हूँ इदराक से आगे अब ढूँढ़ मुझे मजमा-ए-उश्शाक़ से आगे इक सुर्ख़ समुंदर में तिरा ज़िक्र बहुत है ऐ शख़्स गुज़र दीदा-ए-नमनाक से आगे उस पार से आता कोई देखूँ तो ये पूछूँ अफ़्लाक से पीछे हूँ कि अफ़्लाक से आगे दम तोड़ न दे अब कहीं ख़्वाहिश की हवा भी ये ख़ाक तो उड़ती नहीं ख़ाशाक से आगे जो नक़्श उभारे थे मिटाए भी हैं उस ने दरपेश फिर इक चाक है इस चाक से आगे आईने को तोड़ा है तो मालूम हुआ है गुज़रा हूँ किसी दश्त-ए-ख़तरनाक से आगे हम-ज़ाद की सूरत है मिरे यार की सूरत मैं कैसे निकल सकता हूँ चालाक से आगे — Rafi Raza
मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या ज़मीन खींच लूँ और आसमान दे दूँ क्या मैं दुनिया ज़ाद नहीं हूँ मुझे नहीं मंज़ूर मकान ले के तुम्हें ला-मकान दे दूँ क्या कि एक रोज़ खुला रह गया था आईना अगर गवाह बनूँ तो बयान दे दूँ क्या उड़े कुछ ऐसे कि मेरा निशान तक न रहे मैं अपनी ख़ाक को इतनी उड़ान दे दूँ क्या ये लग रहा है कि ना-ख़ुश हो दोस्ती में तुम तुम्हारे हाथ में तीर ओ कमान दे दूँ क्या समझ नहीं रहे बे-रंग आँसुओं का कहा उन्हें मैं सुर्ख़-लहू की ज़बान दे दूँ क्या सुना है ज़िंदगी कोई तह-ए-समुंदर है भँवर के हाथ में ये बादबान दे दूँ क्या ये फ़ैसला मुझे करना है ठंडे दिल से 'रज़ा' नहीं बदलता ज़माना तो जान दे दूँ क्या — Rafi Raza
लम्स को छोड़ के ख़ुशबू पे क़नाअ'त नहीं करने वाला ऐसी-वैसी तो मैं अब तुम से मोहब्बत नहीं करने वाला मुझ से बेहतर कोई दुनिया में किताबत नहीं करने वाला पर तिरे हिज्र की मैं जल्द इशाअत नहीं करने वाला अपने ही जिस्म को कल उस ने मिरी आँखों से पूरा देखा इस से बढ़ कर कोई मंज़र कभी हैरत नहीं करने वाला मज़हब-ए-इश्क़ से मंसूब ये बातें तो ख़ारिज की हैं शाम-ए-हिज्राँ मैं किसी तौर मैं शिरकत नहीं करने वाला ऐसी भगदड़ में कोई पावँ तले आए तो शिकवा न करे गिर गया मैं तो कोई मुझ से रिआ'यत नहीं करने वाला लौ लरज़ने का कोई और ही मतलब न निकल आए कहीं पूछने पर भी चराग़ और वज़ाहत नहीं करने वाला मुझे चलते हुए रस्ते के शजर देखते जाते हैं 'रज़ा' पर मिरे साथ उखड़ कर कोई हिजरत नहीं करने वाला — Rafi Raza
वहशत में निकल आया हूँ इदराक से आगे अब ढूँढ़ मुझे मजमा-ए-उश्शाक़ से आगे इक सुर्ख़ समुंदर में तिरा ज़िक्र बहुत है ऐ शख़्स गुज़र दीदा-ए-नमनाक से आगे उस पार से आता कोई देखूँ तो ये पूछूँ अफ़्लाक से पीछे हूँ कि अफ़्लाक से आगे दम तोड़ न दे अब कहीं ख़्वाहिश की हवा भी ये ख़ाक तो उड़ती नहीं ख़ाशाक से आगे जो नक़्श उभारे थे मिटाए भी हैं उस ने दरपेश फिर इक चाक है इस चाक से आगे आईने को तोड़ा है तो मालूम हुआ है गुज़रा हूँ किसी दश्त-ए-ख़तरनाक से आगे हम-ज़ाद की सूरत है मिरे यार की सूरत मैं कैसे निकल सकता हूँ चालाक से आगे — Rafi Raza
ख़्वाब में या ख़याल में मुझे मिल तू कभी ख़द्द-ओ-ख़ाल में मुझे मिल मेरे दिल की धमाल में मुझे देख मेरे सुर मेरी ताल में मुझे मिल मेरी मिट्टी को आँख दी है तो फिर किसी मौज-ए-विसाल में मुझे मिल मुझे क्यूँँ अरसा-ए-हयात दिया अब इन्हें माह-ओ-साल में मुझे मिल किसी सुब्ह-ए-फ़िराक़ में मुझे छोड़ किसी शाम मलाल में मुझे मिल तू ख़ुद अपनी मिसाल है वो तो है इसी अपनी मिसाल में मुझे मिल तेरे शायान-ए-शाँ है वस्फ़ यही किसी वक़्त-ए-मुहाल में मुझे मिल मेरे कल का पता नहीं मेरी जाँ तू अभी मेरे हाल में मुझे मिल मुझे मिल कर उरूज दे या न दे मेरे वक़्त-ए-ज़वाल में मुझे मिल — Rafi Raza
ज़मीं का बोझ और उस पर ये आसमान का बोझ उतार फेंक दूँ काँधों से दो-जहान का बोझ पड़ा हुआ हूँ मैं सज्दे में कह नहीं पाता वो बात जिस से कि हल्का हो कुछ ज़बान का बोझ फिर इस के बा'द उठाऊँगा अपने आप को मैं उठा रहा हूँ अभी अपने ख़ानदान का बोझ दबी थी आँख कभी जिस मकान-ए-हैरत से अब उस मकाँ से ज़ियादा है ला-मकान का बोझ अगर दिमाग़ सितारा है टूट जाएगा चमक चमक के उठाता है आसमान का बोझ तो झुर्रियों ने लिखा और क्या उठाओगे उठाया जाता नहीं तुम से जिस्म ओ जान का बोझ पलट के आई जो ग़फ़लत के उस कुर्रे से निगह तो सिलवटों में पड़ा था मिरी थकान का बोझ जो उम्र बीत गई उस को भूल जाऊँ 'रज़ा' पुर-ख़याल से झटकूँ गई उड़ान का बोझ — Rafi Raza
आना जाना है तो क़ामत से तुम आओ जाओ दर-ए-इज़हार-ए-मुरव्वत से तुम आओ जाओ वो तहय्युर जो तुम्हें ले के यहाँ आया था उस तहय्युर की विसातत से तुम आओ जाओ हम किसी सम्त बगूलों को नहीं रोकते हैं गर्मी-ए-ज़ौक़ शरारत से तुम आओ जाओ कफ़ उड़ाने पे भी पाबंदी नहीं है कोई हाँ मगर थोड़ी नफ़ासत से तुम आओ जाओ हमें उम्मीद-ए-बलाग़त तो नहीं है तुम से बस ज़रा थोड़ी बुलूग़त से तुम आओ जाओ किस ने रोका है सर-ए-राह-ए-मोहब्बत तुम को तुम्हें नफ़रत है तो नफ़रत से तुम आओ जाओ तुम कि तिफ़्लान-ए-अदब साथ लगाए हुए हो किसी मन्क़ूल शरीअत से तुम आओ जाओ हम ने अश'आर का दरवाज़ा खुला रक्खा है जब भी जी चाहे सहूलत से तुम आओ जाओ — Rafi Raza
रात मैं शाना-ए-इदराक से लग कर सोया बंद की आँख तो अफ़्लाक से लग कर सोया ऊँघता था कहीं मेहराब की सरशारी में इक दिया सा किसी चक़माक़ से लग कर सोया एक जलता हुआ आँसू जो नहीं सोता था देर तक दीदा-ए-नमनाक से लग कर सोया अन-गिनत आँखें मिरे जिस्म पे चुँधयाई रहीं बुक़ा-ए-नूर मिरी ख़ाक से लग कर सोया कूज़ा-गर ने मिरे बारे में ये दफ़्तर में लिखा चाक से उतरा मगर चाक से लग कर सोया नींद की शर्त थी तन्हा नहीं सोना मुझ को हिज्र था सो उसी सफ़्फ़ाक से लग कर सोया रात काँटों पे गुज़ारी तो सवेरे सोचा किस लिए ख़ेमा-ए-उश्शाक़ से लग कर सोया नींद सूली पे चली आई सौ ज़ख़्म-ए-उर्यां अपनी इक ख़्वाहिश-ए-पोशाक से लग कर सोया — Rafi Raza