bachne kii khabar bhi na kisi yaar ko pahunchen | बचने की ख़बर भी न किसी यार को पहुँचे

  - divya 'sabaa'

बचने की ख़बर भी न किसी यार को पहुँचे
बेकार में सदमा कहीं दो-चार को पहुँचे

तलवार से क्या चोट क़लमकार को पहुँचे
वो धार क़लम में है कि तलवार को पहुँचे

ख़िलक़त तो हमें देखने आई थी मगर हम
अख़लाक़ के मारे तिरे दीदार को पहुँचे

हम सरफिरे दस्तार के बंदे हैं सितमगर
सर ले ले मगर हाथ न दस्तार को पहुँचे

बचने में जिस आज़ार से इक 'उम्र लगाई
आख़िर में तो हम भी उसी आज़ार को पहुँचे

अपनों से 'सबा' हमको कोई काम नहीं है
पर चुप हैं कि ये बात न अग़्यार को पहुँचे

  - divya 'sabaa'

More by divya 'sabaa'

As you were reading Shayari by divya 'sabaa'

Similar Writers

our suggestion based on divya 'sabaa'

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari