ऐ मिरी जाँ महजबीं चाहतों पे कर यक़ीन
वस्ल की शब छोड़ दे हँस के कर तू दिन हसीन
इतना मैं क़ाबिल नहीं बात कर लूँ इश्क़ की
जिस्म भर के है हया इश्क़ है पर्दा-नशीन
दर-ब-दर मैं फिर रहा इक वतन ही दिख रहा
एक शाइ'र हूँ मैं तू आशिक़ी की सर-ज़मीन
बोलता दिल जब मिरा बस यही तो कहता है
तू ही सब से नाज़नीं तू ही सब से बेहतरीन
— gabruu govind















