ख़्वाब जो भी बुना वो बुना रह गया

उम्र बीती मगर बचपना रह गया

अक्स जितने थे सारे बदलते रहे
आइना तो वही आइना रह गया

देख कर बादलों का उमड़ता हुजूम
लब पे सूरज के कुछ गुनगुना रह गया

तू मिला तो मुझे ये अचानक लगा
कैसे अब तक मैं तेरे बिना रह गया

हाशिए पर पड़े हम भला क्या कहें
जब भी जो भी कहा अन-सुना रह गया

— Gautam Rajrishi

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