सब को लगता है कि मुझ को भा रहीं तन्हाइयाँ
कौन मानेगा कि मुझ को खा रहीं तन्हाइयाँ
मैं ने कर्कश स्वर में ख़ुद को जैसे तैसे रोका है
उन को लगता है कि मीठा गा रहीं तन्हाइयाँ
देखने पर भीड़ में हँसता हुआ दिखता हूँ मैं
जबकि अंदर से कचोटे जा रहीं तन्हाइयाँ
— Gaurav Kumar Aarambh















