
इक जुस्तजू दीदार के तेरे सिवा कुछ भी नहीं
ऐसा नहीं उन रास्तों पर अब रुका मैं ही नहीं
ज़द में किसी दीवार के उलझी रही हो रौशनी
कमरे में मेरे रौशनी भी अब बसर करती नहीं
— Hrishita Singh
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