कौन रहता ख़फ़ा इतनी सी बात पर
जीना ही कर दिया बार इसी बात पर
मैं ख़फ़ा हूँ अभी उस से जिस बात पर
वो भी मुझ से ख़फ़ा है उसी बात पर
चाहती हूँ के अब मसअला हल हो, वो
चाहता है लड़ाई किसी बात पर
रंजिशें मैं मिटाती रही ज़ेहन से
ता'ने वो दे रहा है इसी बात पर
कहना अबकी लगाएगा मुझ को गले
मुस्कुरा वो रहा था इसी बात पर
— Hrishita Singh















