दिल - लगी से मैं ने उस का दिल लगाकररो रही थी फिर मुहब्बत मुँह छिपाकरकैसे कैसे लोग शामिल बज़्म में हैंऔर वो फिर चल रहा है सर उठा करमर्ज़ की इस के दवा कोई नहीं हैदेखे मैं ने सारे चारा-गर बुलाकरपहले अपने दिल को खोदा होगा उस नेफिर बनाई भीत रब का घर बता कर— Hrishita Singh