jaane tu kya dhoondh raha hai basti mein veeraane mein | जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में

  - Ibn E Insha

जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में
लैला तो ऐ क़ैस मिलेगी दिल के दौलत-ख़ाने में

जनम जनम के सातों दुख हैं उस के माथे पर तहरीर
अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में

महफ़िल में उस शख़्स के होते कैफ़ कहाँ से आता है
पैमाने से आँखों में या आँखों से पैमाने में

किस का किस का हाल सुनाया तू ने ऐ अफ़्साना-गो
हम ने एक तुझी को ढूँडा इस सारे अफ़्साने में

इस बस्ती में इतने घर थे इतने चेहरे इतने लोग
और किसी के दर पे न पहुँचा ऐसा होश दिवाने में

  - Ibn E Insha

Dil Shayari

Our suggestion based on your choice

    हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
    उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
    Bashir Badr
    49 Likes
    उस के दिल की आग ठंडी पड़ गई
    मुझ को शोहरत मिल गई इल्ज़ाम से
    Siraj Faisal Khan
    20 Likes
    तो क्या ये हो नहीं सकता कि तुझ से दूर हो जाऊंँ
    मैं तुझ को भूलने के वासते मजबूर हो जाऊँ

    सुना है टूटने पर दिल सभी कुछ कर गुजरते हैं
    मुझे भी तोड़ दो इतना कि मैं मशहूर हो जाऊँ
    Read Full
    SHIV SAFAR
    दिल में न हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती
    ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती
    Nida Fazli
    34 Likes
    दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा
    कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी
    Ammar Iqbal
    32 Likes
    आप चाहें तो कहीं और भी रह सकते हैं
    दिल हमारा है तो मर्ज़ी भी हमारी होगी
    Shamsul Hasan ShamS
    जितने भी हैं ज़ख़्म तुम्हारे सिल देगी
    होटल में खाने का आधा बिल देगी

    सीधे मुंह जो बात नहीं करती है जो
    तुमको लगता है वो लड़की दिल देगी
    Read Full
    Shadab Asghar
    37 Likes
    वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर'
    जो अपने जान-ओ-दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं
    Lala Madhav Ram Jauhar
    32 Likes
    हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं
    दिल हमेशा उदास रहता है
    Bashir Badr
    112 Likes
    हर दुःख का है इलाज, उसे देखते रहो
    सबकुछ भुला के आज उसे देखते रहो

    देखा उसे तो दिल ने ये बे-साख़्ता कहा
    छोड़ो ये काम काज उसे देखते रहो
    Read Full
    Aslam Rashid
    55 Likes

More by Ibn E Insha

As you were reading Shayari by Ibn E Insha

    दिल किस के तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है
    ये हुस्न-ए-तलब की बात नहीं होता है मिरी जाँ होता है

    हम तेरी सिखाई मंतिक़ से अपने को तो समझा लेते हैं
    इक ख़ार खटकता रहता है सीने में जो पिन्हाँ होता है

    फिर उन की गली में पहुँचेगा फिर सहव का सज्दा कर लेगा
    इस दिल पे भरोसा कौन करे हर रोज़ मुसलमाँ होता है

    वो दर्द कि उस ने छीन लिया वो दर्द कि उस की बख़्शिश था
    तन्हाई की रातों में 'इंशा' अब भी मिरा मेहमाँ होता है
    Read Full
    Ibn E Insha
    दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो
    इस बात से हम को क्या मतलब ये कैसे हो ये क्यूँकर हो

    इक भीक के दोनों कासे हैं इक प्यास के दोनो प्यासे हैं
    हम खेती हैं तुम बादल हो हम नदियाँ हैं तुम सागर हो

    ये दिल है कि जलते सीने में इक दर्द का फोड़ा अल्लहड़ सा
    ना गुप्त रहे ना फूट बहे कोई मरहम हो कोई निश्तर हो

    हम साँझ समय की छाया हैं तुम चढ़ती रात के चन्द्रमाँ
    हम जाते हैं तुम आते हो फिर मेल की सूरत क्यूँकर हो

    अब हुस्न का रुत्बा आली है अब हुस्न से सहरा ख़ाली है
    चल बस्ती में बंजारा बन चल नगरी में सौदागर हो

    जिस चीज़ से तुझ को निस्बत है जिस चीज़ की तुझ को चाहत है
    वो सोना है वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो

    अब 'इंशा'-जी को बुलाना क्या अब प्यार के दीप जलाना क्या
    जब धूप और छाया एक से हों जब दिन और रात बराबर हो

    वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं
    अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर हो
    Read Full
    Ibn E Insha
    राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा
    जी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा

    शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी से
    वीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा

    हाँ यही शख़्स गुदाज़ और नाज़ुक होंटों पर मुस्कान लिए
    ऐ दिल अपने हाथ लगाते पत्थर का बन जाएगा

    दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की
    वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा

    तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमाम
    चाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा
    Read Full
    Ibn E Insha
    रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे
    धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे

    ज़िद्दी वहशी अल्लहड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग
    होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे

    वहशत का उनवान हमारी उन में से जो नार बनी
    देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इंशा'-जी दीवाने थे

    ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी
    इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे

    हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने
    हम क्यूँ उन के दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे
    Read Full
    Ibn E Insha
    सुनते हैं फिर छुप छुप उन के घर में आते जाते हो
    'इंशा' साहब नाहक़ जी को वहशत में उलझाते हो

    दिल की बात छुपानी मुश्किल लेकिन ख़ूब छुपाते हो
    बन में दाना शहर के अंदर दीवाने कहलाते हो

    बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ
    आँख चुरा कर देख भी लेते भोले भी बन जाते हो

    पीत में ऐसे लाख जतन हैं लेकिन इक दिन सब नाकाम
    आप जहाँ में रुस्वा होगे वाज़ हमें फ़रमाते हो

    हम से नाम जुनूँ का क़ाइम हम से दश्त की आबादी
    हम से दर्द का शिकवा करते हम को ज़ख़्म दिखाते हो
    Read Full
    Ibn E Insha

Similar Writers

our suggestion based on Ibn E Insha

Similar Moods

As you were reading Dil Shayari Shayari