आख़िरी दुख है ज़िंदगी का दुख
ज़िंदगी या'नी बेबसी का दुख
हम न रोएँ तो और रोए कौन
शाख़ से टूटी हर कली का दुख
और बहुत दुख हैं ज़िंदगी में दोस्त
तू नहीं मेरी ज़िंदगी का दुख
मैं किसी पल सा देखता हूँ महज़
एक बहती हुई नदी का दुख
कुछ चराग़ों ने बाँट रखा है
दुनिया की सारी तीरगी का दुख
एक मुद्दत से रो नहीं पाया
आज रोऊँगा मैं सभी का दुख
देखिए मैं जो हूँ बहुत ख़ुश हूँ
मुझ को मालूम है ख़ुशी का दुख
मैं इधर तड़पूँ वो उधर तड़पे
यही है 'वीर' दिल-लगी का दुख
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Jangveer Singh Rakesh
our suggestion based on Jangveer Singh Rakesh
As you were reading Udasi Shayari Shayari