khidkiyaan khol do | खिड़कियाँ खोल दो

  - Jawayd Anwar

खिड़कियाँ खोल दो
ज़ब्त की खिड़कियाँ खोल दो
मैं खिलूँ जून की दोपहर में
दिसम्बर की शब में
सभी मौसमों के कटहरे में अपनी नफ़ी का मैं इसबात बन कर खिलूँ
ख़्वाहिशों
नींद की जंगली झाड़ियों
अपने ही ख़ून की दलदलों में खिलूँ
भाइयों की फटी आस्तीनों में
बहनों के सज्दों में
माँ-बाप के बे-ज़बाँ दर्द में अध-जले सिगरटों का तमाशा बनूँ
हर नई सुब्ह के बस-स्टापों पे ठहरी हुई लड़कियों की किताबों में
मस्लूब होने चलूँ
मैं अपाहिज दिनों की नदामत बनूँ
खिड़कियाँ खोल दो
छोड़ दो रास्ते
शहर-ए-बे-ख़्वाब में घूमने दो मुझे
सुब्ह से शाम तक शाम से सुब्ह तक
उस अँधेरे की इक इक करन चूमने दो मुझे
जिस में बेज़ार लम्हों की साज़िश हुई
और दहलों से नहले बड़े हो गए
जिस में बे-नूर किरनों की बारिश हुई
बहर-ए-शब-ज़ाद में जो सफ़ीने उतारे भँवर बन गए
ख़्वाब में ख़्वाब के फूल खिलने लगे खिड़कियाँ खोल दो
जागने दो मुझे

  - Jawayd Anwar

Basant Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Jawayd Anwar

As you were reading Shayari by Jawayd Anwar

Similar Writers

our suggestion based on Jawayd Anwar

Similar Moods

As you were reading Basant Shayari Shayari