परेशाँ लोगों की मैं फ़िक्र करता हूॅं
ख़ुशी ये है मैं अपने बाप जैसा हूॅं
मेरी सूरत तेरी सूरत के जैसी है
मैं ख़ुद को आइने में चूम लेता हूॅं
हुनर सीखा है ये पढ़ कर नियाज़ी को
ज़रूरी काम हो तो देर करता हूॅं
तुम्हारा ग़म कुछ ऐसा है कि फ़िल्मों में
बिछड़ता है कोई तो रोने लगता हूॅं
ये आँखें नींदस अब खौंफ़ खाती हैं
मैं ख़्वाबों में भी अक्सर जाग जाता हूॅं
नहीं लेता ख़ुदा का नाम गिन-गिन कर
दुआ से पहले माला तोड़ देता हूॅं
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