परेशाँ लोगों की मैं फ़िक्र करता हूँ
ख़ुशी ये है मैं अपने बाप जैसा हूँ
मेरी सूरत तेरी सूरत के जैसी है
मैं ख़ुद को आइने में चूम लेता हूँ
हुनर सीखा है ये पढ़ कर नियाज़ी को
ज़रूरी काम हो तो देर करता हूँ
तुम्हारा ग़म कुछ ऐसा है कि फ़िल्मों में
बिछड़ता है कोई तो रोने लगता हूँ
ये आँखें नींद से अब खौंफ़ खाती हैं
मैं ख़्वाबों में भी अक्सर जाग जाता हूँ
नहीं लेता ख़ुदा का नाम गिन-गिन कर
दुआ से पहले माला तोड़ देता हूँ
— "Nadeem khan' Kaavish"















