अगर मैं मर गया मुझ को जला देगी यही दुनिया

किसी के काम भी आया भुला देगी यही दुनिया

सताए थे ज़माने के मगर आगे बढ़े हैं हम
कहानी जीत की मेरी हिला देगी यही दुनिया

लिखा क़िस्मत में जो उस ने वही बस हक़ से पाया है
न पाया हक़ से गर होगा बला देगी यही दुनिया

तराशा इश्क़ से मुझ को मगर मैं अश्म अच्छा जो
रहा बुत इश्क़ में कह कर रुला देगी यही दुनिया

गया था चोट देकर फिर वो आया चोट देने को
तेरी इस चालबाज़ी का सिला देगी यही दुनिया

ज़माने से अगर कह दूँ तुझे सौ बार ओ ज़ालिम
मिटा हस्ती तेरी तुझ को सुला देगी यही दुनिया

— Kushal "PARINDA"

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Zakhm Shayari

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