आसाँ नहीं हैं जीना बिछड़ने के बाद में

  - Harsh Kumar Bhatnagar

आसाँ नहीं हैं जीना बिछड़ने के बाद में
खुलते हैं सब के राज़ तमाशे के बाद में

हैराॅं है आइना भी मुझे देख आज कल
कितना सँवर गया हूँ बिखरने के बाद में

रखियो बना के दूरी तू उन लोगों से ज़रा
कसते हैं तुझ पे तंज़ जो वादे के बाद में

यक-दम नहीं मिलेगा जो लिक्खा तिरे लिए
ज़्यादा ही मिलता है कभी खोने के बाद में

साहब कभी कभार तो चुप्पी भी ठीक है
आएगा सब समझ उन्हें सुनने के बाद में

मरहम ज़रूरी भी नहीं हर वक़्त ज़ख़्म को
बच्चे को उठने दीजिए गिरने के बाद में

मतलब न जाने कितने ही निकलेंगे लफ़्ज़ के
नुक़्ता लगा के देखना लिखने के बाद में

काँधे पे घर का बोझ दिवाने ने रख लिया
करता भी कैसे इश्क़ वो थकने के बाद में

शीरीं-ज़बाँ से पहले लुभाएँगे आप को
रक़्बा निकाल लेंगे दिखावे के बाद में

सिगरेट से पूछिए ज़रा उसको है क्या मिला
मरती है घुट के रोज़ सुलगने के बाद में

कैसे करूँँ ज़रा भी नई नस्ल पे यक़ीन
तस्वीर खेंचते हैं ये मरने के बाद में

नुक़्सान जंग में सदा होता है दोनों सम्त
पत्थर को देखिए कभी शीशे के बाद में

ख़ुद पर यक़ीन है तो रहेगा ख़ुदा का साथ
दफ़्तर को जाना रोज़ तू सज्दे के बाद में

गर्दन के नीचे जा रही आँखों के रोकिए
रुख़्सार देखिए कभी झुमके के बाद में

कैसे जवाब देता मैं दुश्मन के तीर का
इक दोस्त आ खड़ा हुआ नेज़े के बाद में

ता'उम्र ये मलाल रहेगा मुझे सदा
पहुँचा था उसकी डोली के उठने के बाद में

इक बार देखा था उसे अब सोचता हूँ रोज़
कैसा लगेगा शख़्स वो मिलने के बाद में

पहले तो फ़ासला बना के बैठते थे रोज़
अपना बता रहे हैं जनाज़े के बाद में

ये ज़िंदगी भी कोई लतीफ़े से कम नहीं
आती है अब हँसी हमें रोने के बाद में

आता है ख़ौफ़ ख़ुद का ही अब अक्स देख कर
खुलती है आँख जब मिरी सपने के बाद में

जज़्बा कहूँ इसे कोई या है मिरी अना
दुनिया ख़रीद लूँगा कमाने के बाद में

बस इक गुलाब जैसी सभी की है ज़िंदगी
मिलना है सब को ख़ाक में मरने के बाद में

वर्ना तो प्यार हर कोई करता है आजकल
बचता है एतिबार ये रिश्ते के बाद में

पहले उतार देंगे समुंदर में चाँद को
देखेंगे फिर तुम्हें ज़रा बोसे के बाद में

बीते हुए पलों को मैं लिखने लगा था जब
गिरने लगे थे अश्क ये सफ़्हे के बाद में

दिल ने तिरी जुदाई को मक़बूल कर लिया
कुछ भी बचा नहीं था तमाशे के बाद में

शायद कहीं बिगाड़ न दे इसलिए मुझे
माँ प्यार से बुलाती है ग़ुस्से के बाद में

हम तो गुज़ार लेंगे ये हिजरत के दिन मगर
होगा तुम्हारा क्या ही बिछड़ने के बाद में

आएँगे जब परिंदे हमारे घरों की सम्त
कुछ फूल टाँग देंगे दरीचे के बाद में

सूरज चमक उठेगा अदाओं को देख कर
ग़ुंचे खिलेंगे आप के हँसने के बाद में

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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