यक-दम ही मुझ को होने लगी चाय की तलब
सिग्रेट के साथ जा के मिटी चाय की तलब
पीनी पड़ी शराब हमें दोस्तों के साथ
वर्ना हमें तो अस्ल में थी चाय की तलब
तुम को पता है छोड़ना आसाँ नहीं है चाय
होंठों से ही मिटेगी मिरी चाय की तलब
फिर वो कहाँ बिछड़ने का सोचेगा जब उसे
लगने लगेगी नींद में भी चाय की तलब
— Harsh Kumar Bhatnagar















