होती थी जब जब टकरार यहाँ पे
तब भी मिलते थे दो यार यहाँ पे
पहले चाहत में घर वर जलते थे
अब जलते है बस किरदार यहाँ पे
इस ख़ातिर भी ग़म ज़िंदा रहता है
अब मिट जाता है ये प्यार यहाँ पे
हम ख़ुद शर्मिंदा है दिल को दे के
इतना होता है व्यापार यहाँ पे
ये दौलत जितना अंबर चूमेगी
उतना गिरना है संसार यहाँ पे
उन का ही चाहत में कटता है अब
हैं जो भी बनते हुशियार यहाँ पे
अब यारी करना तो हद में रह कर
अब बिक जाता है घर वार यहाँ पे
— Manish watan















