khat se vo zor safa-e-husn ab kam ho gaya | ख़त से वो ज़ोर सफ़ा-ए-हुस्न अब कम हो गया

  - Meer Taqi Meer

ख़त से वो ज़ोर सफ़ा-ए-हुस्न अब कम हो गया
चाह-ए-यूसुफ़ था ज़क़न सो चाह-ए-रुसतम हो गया

सीना-कोबी-ए-संग से दिल-ए-ख़ून होने में रही
हक़-ब-जानिब था हमारे सख़्त मातम हो गया

एक सा आलम नहीं रहता है उस आलम के बीच
अब जहाँ कोई नहीं याँ एक आलम हो गया

आँख के लड़ते तिरी आशोब सा बरपा हुआ
ज़ुल्फ़ के दिरहम हुए इक जम्अ' बरहम हो गया

उस लब-ए-जाँ-बख़्श की हसरत ने मारा जान से
आब-ए-हैवाँ यमन-ए-तालेअ' से मिरे सम हो गया

वक़्त तब तक था तो सज्दा मस्जिदों में कुफ़्र था
फ़ाएदा अब जब कि क़द मेहराब सा ख़म हो गया

इश्क़ उन शहरी ग़ज़ालों का जुनूँ को अब खिंचा
वहशत-ए-दिल बढ़ गई आराम-ए-जाँ रम हो गया

जी खिंचे जाते हैं फ़र्त-ए-शौक़ से आँखों की और
जिन ने देखा एक-दम उस को सो बे-दम हो गया

हम ने जो कुछ उस से देखा सो ख़िलाफ़-ए-चश्म-ए-दाशत
अपना इज़राईल वो जान मुजस्सम हो गया

क्या कहूँ क्या तरहें बदलें चाह ने आख़िर को 'मीर'
था गिरह जो दर्द छाती में सो अब ग़म हो गया

  - Meer Taqi Meer

Mehboob Shayari

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    ना किसी से पास मेरे यार का आना गया
    बस गया मैं जान से अब उस से ये जाना गया

    कुछ न देखा फिर ब-जुज़ यक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब
    शम्अ' तक तो हम ने देखा था कि परवाना गया

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    Meer Taqi Meer
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    इक वक़्त में ये दीदा भी तूफ़ान रो चुका

    अफ़्सोस मेरे मुर्दे पर इतना न कर कि अब
    पछताना यूँ ही सा है जो होना था हो चुका

    लगती नहीं पलक से पलक इंतिज़ार में
    आँखें अगर यही हैं तो भर नींद सो चुका

    यक चश्मक-ए-प्याला है साक़ी बहार-ए-उम्र
    झपकी लगी कि दूर ये आख़िर ही हो चुका

    मुमकिन नहीं कि गुल करे वैसी शगुफ़्तगी
    उस सरज़मीं में तुख़्म-ए-मोहब्बत मैं बो चुका

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    मैं पंजा-ए-मिज़ा से समुंदर बिलो चुका

    हर सुब्ह हादसे से ये कहता है आसमाँ
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    Meer Taqi Meer
    इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई
    आख़िर आख़िर जान दी यारों ने ये सोहबत हुई

    अक्स उस बे-दीद का तो मुत्तसिल पड़ता था सुब्ह
    दिन चढ़े क्या जानूँ आईने की क्या सूरत हुई

    लौह-ए-सीना पर मिरी सौ नेज़ा-ए-ख़त्ती लगे
    ख़स्तगी इस दिल-शिकस्ता की इसी बाबत हुई

    खोलते ही आँखें फिर याँ मूँदनी हम को पड़ीं
    दीद क्या कोई करे वो किस क़दर मोहलत हुई

    पाँव मेरा कल्बा-ए-अहज़ाँ में अब रहता नहीं
    रफ़्ता रफ़्ता उस तरफ़ जाने की मुझ को लत हुई

    मर गया आवारा हो कर मैं तो जैसे गर्द-बाद
    पर जिसे ये वाक़िआ पहुँचा उसे वहशत हुई

    शाद ओ ख़ुश-ताले कोई होगा किसू को चाह कर
    मैं तो कुल्फ़त में रहा जब से मुझे उल्फ़त हुई

    दिल का जाना आज कल ताज़ा हुआ हो तो कहूँ
    गुज़रे उस भी सानेहे को हम-नशीं मुद्दत हुई

    शौक़-ए-दिल हम ना-तवानों का लिखा जाता है कब
    अब तलक आप ही पहुँचने की अगर ताक़त हुई

    क्या कफ़-ए-दस्त एक मैदाँ था बयाबाँ इश्क़ का
    जान से जब उस में गुज़रे तब हमें राहत हुई

    यूँ तो हम आजिज़-तरीन-ए-ख़ल्क़-ए-आलम हैं वले
    देखियो क़ुदरत ख़ुदा की गर हमें क़ुदरत हुई

    गोश ज़द चट-पट ही मरना इश्क़ में अपने हुआ
    किस को इस बीमारी-ए-जाँ-काह से फ़ुर्सत हुई

    बे-ज़बाँ जो कहते हैं मुझ को सो चुप रह जाएँगे
    मारके में हश्र के गर बात की रुख़्सत हुई

    हम न कहते थे कि नक़्श उस का नहीं नक़्क़ाश सहल
    चाँद सारा लग गया तब नीम-रुख़ सूरत हुई

    इस ग़ज़ल पर शाम से तो सूफ़ियों को वज्द था
    फिर नहीं मालूम कुछ मज्लिस की क्या हालत हुई

    कम किसू को 'मीर' की मय्यत की हाथ आई नमाज़
    ना'श पर उस बे-सर-ओ-पा की बला कसरत हुई
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    Meer Taqi Meer
    शहर से यार सवार हुआ जो सवाद में ख़ूब ग़ुबार है आज
    दश्ती वहश ओ तैर उस के सर तेज़ी ही में शिकार है आज

    बरफ़रोख़्ता रुख़ है उस का किस ख़ूबी से मस्ती में
    पी के शराब शगुफ़्ता हुआ है उस नौ-गुल पे बहार है आज

    उस का बहर-ए-हुस्न सरासर औज ओ मौज ओ तलातुम है
    शौक़ की अपने निगाह जहाँ तक जावे बोस-ओ-कनार है आज

    आँखें उस की लाल हुईं हैं और चले जाते हैं सर
    रात को दारू पी सोया था उस का सुब्ह ख़ुमार है आज

    घर आए हो फ़क़ीरों के तो आओ बैठो लुत्फ़ करो
    क्या है जान बिन अपने कने सो इन क़दमों पे निसार है आज

    क्या पूछो हो साँझ तलक पहलू में क्या क्या तड़पा है
    कल की निस्बत दिल को हमारे बारे कुछ तो क़रार है आज

    ख़ूब जो आँखें खोल के देखा शाख़-ए-गुल सा नज़र आया
    उन रंगों फूलों में मिला कुछ महव-ए-जल्वा-ए-यार है आज

    जज़्ब-ए-इश्क़ जिधर चाहे ले जाए है महमिल लैला का
    यानी हाथ में मजनूँ के नाक़े की उस के महार है आज

    रात का पहना हार जो अब तक दिन को उतारा उन ने नहीं
    शायद 'मीर' जमाल-ए-गुल भी उस के गले का हार है आज
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    Meer Taqi Meer
    गुल को महबूब हम-क़्यास किया
    फ़र्क़ निकला बहुत जो पास किया

    दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना
    एक आलम का रू-शनास किया

    कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन
    शौक़ ने हम को बे-हवास किया

    इश्क़ में हम हुए न दीवाने
    क़ैस की आबरू का पास किया

    दौर से चर्ख़ के निकल न सके
    ज़ोफ़ ने हम को मूरतास किया

    सुब्ह तक शम्अ' सर को धुनती रही
    क्या पतिंगे ने इल्तिमास किया

    तुझ से क्या क्या तवक्क़ोएँ थीं हमें
    सो तिरे ज़ुल्म ने निरास किया

    ऐसे वहशी कहाँ हैं ऐ ख़ूबाँ
    'मीर' को तुम अबस उदास किया
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    Meer Taqi Meer

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