लड़ के फिर आए डर गए शायद
बिगड़े थे कुछ सँवर गए शायद
सब परेशाँ दिली में शब गुज़री
बाल उस के बिखर गए शायद
कुछ ख़बर होती तो न होती ख़बर
सूफ़ियाँ बे-ख़बर गए शायद
हैं मकान ओ सरा ओ जा ख़ाली
यार सब कूच कर गए शायद
आँख आईना-रू छुपाते हैं
दिल को ले कर मुकर गए शायद
लोहू आँखों में अब नहीं आता
ज़ख़्म अब दिल के भर गए शायद
शोर बाज़ार से नहीं उठता
रात को 'मीर' घर गए शायद
— Meer Taqi Meer















