mustoojib-e-zulm-o-sitam-o-jaur-o-jafa hooñ | मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ

  - Meer Taqi Meer

मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ
हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ

आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़
रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ

इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं
हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ

हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क
अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ

आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी
आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ

दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर
हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ

दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ
मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ

गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब
बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ

इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़
मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ

बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ
मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ

तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक 'उम्र
जूँ शम्अ' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ

सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक
है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

  - Meer Taqi Meer

Gussa Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Meer Taqi Meer

As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer

Similar Writers

our suggestion based on Meer Taqi Meer

Similar Moods

As you were reading Gussa Shayari Shayari