दरिया वो अपनी धुन में बहाता चला गया
ये इश्क़ उँगलियों पे नचाता चला गया
खाई क़सम थी अब कोई दिल को न भाएगा
इक शख़्स दिन-ब-दिन इसे भाता चला गया
करता रहा वो फ़िक्र मुसलसल मेरी मगर
खु़द राज़ ये सीने में छुपाता चला गया
कोई भी नाम उसने दिया ही नहीं कभी
इस रिश्ते को मगर वो निभाता चला गया
है रोग या दवा ये मुहब्बत नहीं पता
ये इक सवाल दिल को सताता चला गया
मंज़र बड़ा ही खूब था वो था मेरे क़रीब
मैं उस
में और वो मुझ
में समाता चला गया
जब भी थकी मैं दुनिया के रस्मों रिवाज़ से
हर पल ही हाथ मुझ को थमाता चला गया
खो ही दिया था ख़ुद को ज़माने की भीड़ में
वो फर्श़ से फ़लक पे उठाता चला गया
ख़्वाहिश दो लफ्ज़ सिर्फ़ थी तारीफ की मुझे
वो शान में कसीदे सुनाता चला गया
बाहर समझ से थीं मेरी सारी रिवायतें
है क्या सही ग़लत वो बताता चला गया
ये प्यार छोड़ दो वो जो इज़्ज़त न कर सका
हर एक शख़्स मुझ को गँवाता चला गया
मुझ को नहीं पता है कि तू कौन है मिरा
इक आईना वजूद दिखाता चला गया
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