निगार-ए-दश्त में जो तिफ़्ल पा-पियादा है

मुसव्विरो वो किसी घर का शाहज़ादा है

मोहब्बतों में ख़सारा ही इस्तिफ़ादा है
अब अपने आप से पूछो कि क्या इरादा है

वरक़ पे बिखरा है जो दर्द शे'र की सूरत
ये रेज़ा-रेज़ा हुए ख़्वाब का बुरादा है

बिछड़ के तुम भी अभी सोगवार हो शायद
मेरे भी लब पे तबस्सुम फ़क़त लबादा है

मैं मुतमइन था तह-ए-दिल में दफ़्न कर के जिसे
वो कनखियों के दरीचों पे बे-लिबादा है

— Manmauji

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